यह डिबेट 2006 में Peace TV के लॉन्च के समय आयोजित की गई थी। उद्देश्य यह था कि दो अलग-अलग धार्मिक दृष्टिकोणों—इस्लाम (जो एकेश्वरवाद या 'तौहीद' पर जोर देता है) और हिंदू धर्म (जो विविधता और निराकार-साकार ईश्वर को मानता है)—के प्रमुख विद्वान एक साथ आकर धार्मिक ग्रंथों के आधार पर चर्चा करें।
डॉ. नाइक से पूछा गया कि क्या वे हिंदू अवतारों को अल्लाह का दूत मानते हैं? उन्होंने जवाब दिया कि कुरान के अनुसार हर कौम में मार्गदर्शक भेजे गए हैं, इसलिए यह संभव है, लेकिन चूंकि उनके मूल संदेश समय के साथ बदल गए, इसलिए अब केवल अंतिम संदेश (कुरान) का पालन करना चाहिए।
यह सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। आर्ट ऑफ लिविंग के बयान के अनुसार, जब जाकिर नाइक अपनी बातें कह रहे थे, तो हो गया था। ऐसे में श्री श्री रवि शंकर ने शांति बनाए रखने के लिए जवाबी बहस नहीं की (Did not press his argument)। उन्होंने सिर्फ कबीर का एक दोहा पढ़ा:
उन्होंने दावा किया कि बाद के समय में लोगों ने अपनी सुविधा के लिए मूर्तियां बनाईं, जबकि मूल सनातन ग्रंथ इसके खिलाफ हैं। यह बात इस्लाम के 'तौहीद' (एक ईश्वरवाद) के बिल्कुल करीब है। dr zakir naik vs sri sri ravi shankar debate full in hindi
📌 निष्कर्ष: इस बहस से हमें क्या सीख मिलती है?
इस बहस के बाद लोगों में वेदों, उपनिषदों और कुरान को एक साथ समझने की जिज्ञासा बढ़ी।
श्री श्री रवि शंकर ने पारंपरिक बहस के मुकाबले आध्यात्मिक सद्भाव और प्रेम को अपना हथियार बनाया। इसलिए यह संभव है
यह बहस हमें सिखाती है कि अलग-अलग विचारधाराओं के होने के बावजूद, दो बड़े धार्मिक नेता एक मंच पर बैठकर शांतिपूर्वक संवाद कर सकते हैं। इसने दुनिया को दिखाया कि इस्लाम और हिंदू धर्म के मूल सिद्धांतों में ईश्वर को लेकर कई समानताएं मौजूद हैं।
डॉ. जाकिर नाइक और श्री श्री रवि शंकर की यह पूरी बहस यह दर्शाती है कि धार्मिक और वैचारिक मतभेदों के बावजूद एक मंच पर बैठकर सभ्यता के साथ संवाद किया जा सकता है। यह आयोजन किसी की जीत या हार से परे, अंतर-धार्मिक संवाद (Interfaith Dialogue) के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में याद किया जाता है।
उन्होंने जोर दिया कि ईश्वर की अवधारणा में एकता ही सही मार्ग है। dr zakir naik vs sri sri ravi shankar debate full in hindi
इस ऐतिहासिक बहस के बारे में आपकी क्या राय है? यदि आप इसके किसी विशेष हिस्से पर विस्तार से चर्चा करना चाहते हैं, तो मुझे बताएं:
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उन्होंने दोनों धर्मों के ग्रंथों से यह साबित करने की कोशिश की कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है, उसका कोई माता-पिता नहीं है, और वह अजन्मा है।
श्री श्री से पूछा गया कि अगर ग्रंथों में मूर्ति पूजा मना है, तो समाज इसे बढ़ावा क्यों देता है? श्री श्री ने बहुत ही खूबसूरती से जवाब दिया कि एक बच्चा पहले खिलौनों से खेलता है, फिर धीरे-धीरे ज्ञान की ओर बढ़ता है। मूर्ति शुरुआती कदम है, अंतिम मंजिल नहीं।
डॉ. जाकिर नाइक ने अपने व्याख्यान की शुरुआत इस्लाम के मूल सिद्धांत से की। उन्होंने हिंदू धर्मग्रंथों का संदर्भ देते हुए यह साबित करने का प्रयास किया कि सनातन धर्म के मूल ग्रंथ भी एक ही ईश्वर की पूजा का संदेश देते हैं।